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आकाश है जनचेतना

बिलखते शब्दों की अंतिम आस है जनचेतना।
सिकुड़ते साहित्य की हर साँस है जनचेतना।

June 14, 2018

मृत्यु बाँट रहे हो तुम

कहाँ खुरदरी खुरपी लेकर, समतल पाट रहे हो तुम?
कंकड़ की ढेरी परोसकर, हीरे छाँट रहे हो तुम।

मा...

June 12, 2018

मुंह पर कालिख

गौतम बुद्ध की धरती पर, और आर्यभट्ट की माटी में।
पूरा विश्व झुका था जिनके, पुरखों की परिपाटी में।

June 12, 2018