अगर बढ़ चल चुके हो तुम

अगर बढ़ चल चुके हो तुम,
तो मंजिल पर नज़र रखना।
टिकाना निमित्त पर नजरें,
नहीं बाकी कसर रखना।

कभी भौंकेंगे भी तुम पर,
फ़कत गलियों के भी कुत्ते,
कभी नोचेंगे – झपटेंगे,
तेरी रफ़्तार के बूते।

तुम्हें रोकेंगे जी भर कर,
मगर चालू सफर रखना।
अगर बढ़ चल चुके हो तुम,
तो मंजिल पर नज़र रखना।

समय निश्चित बदलता है,
अगर संयम न व्यय होगा।
तुम्हारी सहनशक्ति से,
तुम्हारा लक्ष्य तय होगा।

तुम्हारा भी समय होगा,
यही विश्वास धर रखना।
अगर बढ़ चल चुके हो तुम,
तो मंजिल पर नज़र रखना।

तुम्हारी आँख नम होगी,
तो ईश्वर दर्ज कर लेगा।
सदा विश्वास बस रखना,
विधाता फ़र्ज़ कर लेगा।

तेरा ईमान कम ना हो,
सदा इसकी फ़िकर रखना।
अगर बढ़ चल चुके हो तुम।
तो मंजिल पर नज़र रखना।

कभी अपने तुम्हारे भी,
तेरा प्रतिकार कर देंगे।
तुम्हारे साथ चलने से,
कभी इनकार कर देंगे।

तुम्हें लड़ना अकेले है,
अकेले ही असर रखना।
अगर बढ़ चल चुके हो तुम,
तो मंजिल पर नज़र रखना।


~ पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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