अनखा के ई दौलत हे।

एक लबज ना बोलत हे,
पर भेद सगर के खोलत हे।
छुअऊँ, छापऊँ, बुरा न माने,
मुँह कबो ना झोलत हे।।

हमरे से सट्टल सगरी ई,
नगरी-नगरी डोलत हे।
राम कसम एंड्राइड नाही,
अनखा के ई दौलत हे।।

हम्मर अंगठा पर नाचे,
पर हमरो नाच नचाबे।
दु गो उँगरी, मैसेज झंगड़ी,
किट-किट तान सुनाबे।।

हमरे जनमल, हमरे बुतरू,
हमरे रोज चराबे,
लगल फौन पर गरलफेन से,
भुनुर-भुनुर बतियाबे।।

मेहरारू भी बेल्ले-मौके,
भाचप-चैट टटोलत हे।
राम कसम एंड्राइड नाही,
अनखा के ई दौलत हे।।

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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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