अबकी छठ न आ पाउँगा।

अबकी छठ न आ पाउँगा, खुद ही पर्व कर लेना तुम,
बच्चे गर पूछें तो उनको,प्यार से समझा देना तुम।

कह देना पापा सरहद पर, लिए तिरंगा बैठे हैं।
आँखों में लेकर घर-आँगन, यमुना-गंगा बैठे हैं।

अपनी मैया के आँचल में, माथा ढंककर लेटे हैं।
उनके जैसे कितने, सीने में परिवार समेटे हैं।

फिर भी न मानें तो मेरी, वर्दी दिखला देना तुम।
अबकी छठ न आ पाउँगा, खुद ही पर्व कर लेना तुम।

माँ-बापू से कह देना तुम, व्याकुल न हों मेरे बिन।
बाबा क्यूँ हैं बाट जोहते? माँ अकुलातीं घड़ियाँ गिन।

उन बूढ़ी आँखों में पानी, मुझको यहाँ रुलाती है।
दो मायें एक साथ रुदन कर, अपने पास बुलाती हैं।

उनकी हरदम सेवा करना, उनको साहस देना तुम।
अबकी छठ न आ पाउँगा। खुद ही पर्व कर लेना तुम।

मुझे पता है पीर तुम्हारी, मुझे भी होती पीड़ा है।
पर क्या करूँ? वतन की खातिर, जो सम्हाला बीड़ा है।

प्रिये! तुम्हारी व्याकुलता अब, मुझको यहाँ जकड़ती है।
जब जब शस्त्र सम्हाला मैंने, प्रीती पैर पकड़ती है।

दिल धरने को आज तनिक, गहरा सिन्दूर कर लेना तुम।
अबकी छठ न आ पाउँगा, खुद ही पर्व कर लेना तुम।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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