उसको कफ़न बदलना है

है अजीब सा मौन यहाँ पर! किस भाँति यह क्रंदन है?
दृश्य बड़ा वीभत्स यहाँ, निर्जनता का अभिनंदन है।

एक नार सदा को सोई है, घर के रजयुक्त ओसारे पर।
कैसी धूसरित सी लेटी है! निश्तेज, निठुर, निश्चल होकर।

क्या बेसुध होकर सीख रही वह, मृत्यु-बाद सलीकों को?
या सूनेपन से सींच रही है, मन में उठती चीखों को?

अधर-स्निग्धता तार-तार, आंखों में शुष्क समाया है।
अध-खुले उरोजों पर उसने, आँचल तक नहीं चढ़ाया है।

कैसी यह पाँवों में जकड़न? दुस्तर जंघाओं का मुड़ना।
भयभीत करे हैं, भृकुटि पर, निष्प्राण से केशों का उड़ना।

अब देह में उसकी गति नहीं, मानस में उसके मति नहीं।
मृत्यु का तो आलिंगन है, पर जीवन से सहमति नहीं।

वह सँवर रही आखिरी बार, दूजों के दिये सहारे से।
है आज विदा होना उसको, इस आंगन से, ओसारे से।

मर कर भी उसके आनन पर, चिंता की कई लकीरें हैं।
कोई तो मजबूरी उसकी, कुछ तो अफसोस की पीरें हैं।

दो पल समेट रख लेने को, मातृत्व के उन अहसासों को।
करने नवजात का आलिंगन, वह तड़प रही है साँसों को।

थी आज बनी, क्षणभर जननी, पर लख न सकी दुलारे को।
एक जीवन रचकर धरती पर, वह लौट चली यम-द्वारे को।

कैसा कुदरत का नियम, हाय! कैसी “नियति का ढलना” है?
पलने में भूखा “ललना” है, और उसको “कफ़न बदलना” है!!

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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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