उसे फिर शर्म कैसे हो

जो न किरणों की घूँघट हो, तो सुबह गर्म कैसे हो?
कभी मुट्ठी न बाँधी तो, हथेली नर्म कैसे हो?

छुपाना भी जरुरी है, कहीं आँखों में कुछ लज्जा।
जो है बेशर्म सदियों से, उसे फिर शर्म कैसे हो?

कहीं इंसानियत भी मर चुकी है, लाश चलती है।
ये गिरगिट की तरह हर वक़्त ही, रंगत बदलती है।

दिखावे की पिपासा है यहाँ, हर शख्स को बंधु,
कि “करुणा” कैमरे के सामने, करवट बदलती है।

उंगलियाँ रक्तरंजित हों, तो फिर सत्कर्म कैसे हो?
जो है बेशर्म सदियों से, उसे फिर शर्म कैसे हो?

कि मज़हब के फिदायीनों ने, हमको काट खाया है।
वो अब हथियार मतभेदी, सबों में बाँट आया है।

खुदा तू खुद बता कि मैं कहाँ सिजदा करूँ तुझको?
तेरा बंदा तेरी धरती, लहू से पाट आया है।

कहो हैवानियत इंसानियत का धर्म कैसे हो?
जो है बेशर्म सदियों से,उसे फिर शर्म कैसे हो?


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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