एक आस अभी भी बाकी है

माँ के आँचल की वह भीनी,

खुशबू थी संचय कर ली।

आँगन की मिट्टी की,

सोंधेपन से थी तृप्ति कर ली।

यूँ तो धूल फाँककर हमने,

महक भी अपनी खो दी है।

पर, मिट्टी के उस सोंधेपन की,

बास अभी भी बाकी है|

एक आस अभी भी बाकी है………. ||

जिन हाथों ने सिर सहलाकर,

स्वर्ग सी अनुभूति दे दी।

एक प्रण की खातिर मूरख ने,

उस प्रेम की आहूति दे दी।

था संघर्ष थपेड़ों से,

बस चोट ही अनगिन खाए हैं।

पर माँ के कोमल करतल का,

आभास अभी भी बाकी है।

एक आस अभी भी बाकी है………. ||


~ पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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