एक कटोरी दूध

ना कोई रविवार न छुट्टी, ना ही मंगल-बुध उसका।
लल्ली उसकी भूखी मरती, जोर न चलता खुद उसका।
उसकी आँखों के दर्रों का सारा पानी सूख गया।
बढ़ रहा है क्षुध उसका, ले-ले कोई सुध उसका।

एक कटोरी दूध दिला दे, वो हफ्तों से भूखी है।
एक कटोरी दूध पिला दे, उसकी जिह्वा रूखी है।
एक कटोरी दूध की कीमत उस मैया से पूछो ना,
जिसकी छाती सूखी है, और लल्ली जिसकी भूखी है।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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