कागज़ के खेतों पर

कभी वह सौ ही शब्दों से, समूचा शास्त्र लिखता है।
कभी वर्णों के ही बारूद से, ब्रह्मास्त्र लिखता है।

कवि की सृजन-क्षमता पर, कभी संदेह मत करना।
कवि तो “रोशनाई” से ही पूरा “राष्ट्र” लिखता है।

कि जब कागज़ के खेतों पर, कवि कलमें चलाता है।
तो भावों से भरे बीजों से, अंकुर फूट आते हैं।

पुनः शब्दों पे जब वह शिल्प का, छिड़काव करता है,
तो कुंठा के भी खर-पतवार, सारे टूट जाते हैं।

कवि अच्छा कृषक भी है, कि वह यव-पात्र लिखता है।
कवि तो रोशनाई से ही, पूरा राष्ट्र लिखता है।

स्वयं शत्रु के खेमे में, कोई भूचाल बन जाए।
कवि तबियत से जो लिख दे, कलम भी काल बन जाए।

ये छर्रे छंद के मारे, या फेंके गद्य के गोले,
अरि को हो हताशा जब, जला दे शब्द के शोले।

कवि ऐसा सिपाही है, जो आग्नेयास्त्र लिखता है।
कवि तो रोशनाई से ही, पूरा राष्ट्र लिखता है।

कि वाक्यों में कभी वह व्यंग्य की, सूई चुभोता है।
कभी उपमा के औषध से, नई ऊर्जा पिरोता है।

पदों का “शल्य” करता है, तो साहित् सुध भी खोता है,
पुनः मिलता नया जीवन, कभी अनुभव भी होता है।

कवि अच्छा चिकित्सक है, कि वह वृहदांत्र लिखता है।
कवि तो रोशनाई से ही पूरा राष्ट्र लिखता है।

कभी वातावरण से विषय का, वह वरण करता है,
उसके मर्म का वह मूक होकर मनन करता है।

कि बन पड़ती है फिर तो, काव्य-रस की चाशनी जैसी,
कि हो सद्चित वो सज्जन, शब्द ऐसे चयन करता है।

कवि है शिष्य प्रकृति का, जो प्रकृति-मात्र लिखता है।
कवि तो रोशनाई से ही, पूरा राष्ट्र लिखता है।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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