काले धन का क्या होगा ?

पैसों की थी प्यास कहो, उस पागलपन का क्या होगा?
खोर-खोर कर जमा किया, उस खर-दूषण का क्या होगा?

क्या होगा उस मुट्ठी का? जिस मुट्ठी में मक्कारी थी।
गोरी चमड़ी वालों, तुमरे.. काले धन का क्या होगा?

बेशर्मी की “बोरी” में, जो “गड्डी” है गद्दारी की।
काली करतूतों से उपजी, मुद्रा वह मक्कारी की।

माल पीटने वालों के घर, मैय्यत का मंजर भी है।
रोज रिस रही शनैः शनैः, जो तोंद फुलाती चर्बी है।

हरे रंग की हरी मियादी, उस उबटन का क्या होगा?
गोरी चमड़ी वालों, तुमरे… काले धन का क्या होगा?

जिसकी आंच पे औंट रहे थे, घट्ठा-घोल सियासत का।
कपट-कोष सब धरा रह गया, राजा तेरी रियासत का।

रद्दी होकर निकलेगी, या सब चूहे खा जाएंगे।
ठरकी! ठोकर खाकर ही, तेरे होश ठिकाने आएंगे।

खुदगर्जी की खाद से पोषित, उस उपवन का क्या होगा?
गोरी चमड़ी वालों, तुमरे… काले धन का क्या होगा?


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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