कोई नहीं होता

यहाँ बहुरूप सी दुनिया में हर कोई रँगा सा है,
निरन्तर एक से ही रंग में, कोई नहीं होता।
कमी तो सब बता देते हैं मुझमें एक झटके में।
मगर दुर्भाग्य! खुद भी ढंग में कोई नहीं होता।।

यूँ कहने को तो है आतिथ्य अजी सौभाग्य आँगन का।
मगर स्वजनों से कभी स्वायत्तता भी छिन ली जाती है।
जबरदस्ती दिखाते हैं यहाँ मेहमाँ-नवाजी पर,
यहाँ पर रोटियाँ तक थालियों में गिन ली जाती हैं।

कि गहरे प्रेम के प्रसंग में कोई नहीं होता।
अजी दुर्भाग्य! खुद भी ढंग में कोई नहीं होता।

भले मुख पर हो मुस्काहट किसी की देखकर खुशियाँ,
मगर दिल में छिपा बस डाह का ही भाव होता है।
उगलते हैं शहद के तार जैसी मधुर सी बोली,
मगर जिह्वा के भीतर जहर का ही स्राव होता है।

कि खुश अपनों के ही उमंग में कोई नहीं होता,
अजी दुर्भाग्य! खुद भी ढंग में कोई नहीं होता।

कि अपने स्वाभिमां को छोड़कर अपना नहीं कोई।
यहाँ वो लाभ के आधार पर परिवार चुनते हैं।
यकीनन फायदा जिससे नहीं वह फालतू ही है,
यहाँ बस स्वार्थ के सूते से ही संबंध बुनते हैं।

मुसीबत में पड़ो, फिर संग में कोई नही होता।
अजी दुर्भाग्य! खुद भी ढंग में कोई नहीं होता।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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