गोरी तुम्हरे चक्कर में

 

मन मिसरी, मतवाली भे गई, गोरी तुम्हरे चक्कर में।
घर थाना, कोतवाली भे गई, गोरी तुम्हरे चक्कर में।

हमरे आधे वेतन का तुम, तन पर लिए लबादा हो।
घर गिरवी जाए तुम करती, मेकअप इतना ज्यादा हो।

अरे अपनी धोकड़िया खाली भे गई, गोरी तुम्हरे चक्कर में।
घर थाना, कोतवाली भे गई, गोरी तुम्हरे चक्कर में।

बटुए की मोटाई सुसरी, तिरछे आँख से तोलेगी,
ढाई गज की साइज लेकर, पूरा मॉल टटोलेगी।

इसके गुपचुप के चक्कर में, गुमसुम बटुआ बैठा है।
जब जब नोट निकाला सुसरा, हम पर खखुआ बैठा है।

अरे अंदर तक फटेहाली भे गई, गोरी तुम्हरे चक्कर में।
सब कविता कव्वाली भे गई, गोरी तुम्हरे चक्कर में।


~पं० सुमित शर्मा ‘पीयूष’

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