चयन एवं उसका महत्व

चयन एवं उसका महत्व

हमारे जीवन की सफलता एवं असफलता में चयन का सबसे बड़ा योगदान होता है।
हमारा मान, सम्मान, यश, अपयश सब कुछ चयन पर ही निर्भर करता है। चयन उचित है या अनुचित ये मानव को स्वयं निर्धारित करना पड़ता है। चयन उचित है तो परिणाम उचित होगा, चयन अनुचित है तो परिणाम भी आशा के विपरीत ही होगा।
उदाहरण के हम चार घड़ों को चार प्रकार के रंग से रंग देते हैं, और चारों में जल भर देते हैं। अब किसी से पूछिए कि इन चार घड़ों में क्या भरा है तो बिना देखे वो बता नहीं सकता कि क्या भरा है, उसे लगेगा चारों में अलग अलग द्रव्य भरा है। जब वो समीप आकर देखेगा तो उसे पता चलेगा कि उन चारों घड़ों के अंदर जल ही भरा है। जल को अपना पात्र चयन करने का अधिकार नहीं होता हम उसे जिस पात्र में रख दें वहीं पर अपना स्थान बना लेता है। परंतु हमें अपना चयन करने का अधिकार है। ये चार घड़े सिर्फ आवरण हैं, परिवेश हैं जिनके अंदर सिर्फ जल है, घड़ों पर रंग तो सिर्फ पहचान करने के लिए चढ़ाया जाता है। इसी प्रकार मनुष्य किसी भी परिवेश में रहे, किसी भी वातावरण में रहे, किसी भी धर्म समुदाय में जन्मा हो वह उसका आवरण होता है परंतु चयन का अधिकार उसे होता है, कि वह किस आवरण में किस परिवेश में रहना चाहता है। क्योंकि हर आवरण में है तो मनुष्य ही।
यदि हमारा चयन, सत्य, धर्म,सेवा,सद्मार्ग, न्याय का होता है तो हमारा चयन हमें उन्नति, यश, और परमात्मा हमें जोड़ता है। इसके विपरीत यदि हमारा चयन असत्य, छल, पाप, अधर्म, अन्याय, का होता है तो हमें हमारा चयन हमें पतन, अपयश, कलंक, और विनाश की ओर ले जाता है।
यही है चयन और उसका महत्व।
हमें जीवन के हर क्षण में अपना चयन सोच समझकर करना चाहिए।
इस आलेख का यही संदेश है।
लेखन — *आशीष पाण्डेय जिद्दी*

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