जब थम गई थी लेखनी

थरथराती उँगलियों को थामकर, सम्हालकर,
आँसुओं की रोशनाई लेखनी में डालकर।

आज करतल पर सहज ही कुछ लकीरें खींच दी,
काट दी रेखा जहाँ कुंठा रखी थी पालकर।

मैं रुका तो रुक गई थी साथ मेरे जिंदगी,
रुक गया जल-थल-पवन और रुक गई थी रोशनी,

रोक रक्खा था कहीं सूरज ने अपने अश्व को,
थम चुकी थी हर दिशा, जब थम गई थी लेखनी।

घुट रही थी आत्मा, इस बात का न भान था,
हो रहा संवेदनाओं का बड़ा नुकसान था।

आज निंदक बन रहे थे शब्द भी मेरे प्रति।
रो रही थी पंक्तियाँ, इससे भी मैं अन्जान था।

होश आया तब, किसी ने जब कहा तू भय न कर,
है तेरे ही साथ तेरी लेखनी, विस्मय न कर।

भाग! बस तू भाग जैसे भागती है जिंदगी,
है समय गतिशील, इसके वेग पर संशय न कर।


~पं0 सुमित शर्मा “पियूष”

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