जिला अब बाढ़ कर

शीत सुरभी की, सुनहरी छाँव की,

यह विरासत है सती के गाँव की।

लाई के मादक अनिल प्रवाह की,

पाक चिष्ती के सुघड़ दरगाह की।

उम्द-उर्वर-उरनिहित उल्लास की,

सत्य के संकुचित होते साँस की।

लिपि-मजहब से पृथक मनमीत की,

चाषनी में डूबते संगीत की।

बहे उत्तरवाहिनी गंगा जहाँ,

बह गया है दर्प बेरंगा जहाँ |

ऋषि-मुनियों के सुलभ-संज्ञान से,

नाम लेते बाढ़ का सम्मान से।

आज इसके घाट जर्जर रो रहे,

चीथड़ों में अस्मतें संजो रहे।

सदी तक सोयी रही सरकार है,

अब निमित्त से दया की दरकार है।

गुप्त संस्कृति है अब विस्तार कर,

कसम है तुझको जिला अब बाढ़ कर।


~ पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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