तरुवर सूखे जात

आँसू आए आँख में, देख प्रकृति का हाल।
जंगल मिटते देखकर, हर प्राणी बेहाल।

हवा नहीं हैं शुद्ध अब, पानी बिकता देख।
भाग्यविधाता का नहीं, खुद मानव का लेख।

अंबर से बरसे अगन, बादल सारे खोय।
अब धरती को ताप में , कैसे साहस होय।

जल बिन सूना ताल है, तरुवर सूखे जात।
तृष्णा में धरती जले, जीवन की है मात।

खग नभचर जलचर सभी, दर दर ढूढें नीर।
प्यास से बढ़कर है नहीं, प्राणी कोई पीर।

जल संचय करने लगो, वन से जीवन जान।
बादल बारिश वायु सब, वन का हैं वरदान।

~आशीष पाण्डेय जिद्दी

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