तुम सुबह उसको दे दो, वह शाम नहीं होने देगी

खुद लेगी इल्जाम, तुम्हें बदनाम नहीं होने देगी।
आँचल से ढँक लेगी, तुमपे घाम नहीं होने देगी।

पत्नी असल हितैषी है, अजी कोई हँसी की पात्र नहीं!
तुम सुबह उसको दे दो, वह शाम नहीं होने देगी।

वजू करेगी शक्ल तुम्हारी, पौ फटते ही आँखों से।
जकड़ रखेगी आह तलक, बाहों की बनी सलाखों से।

सीने का तकिया, तलवों का पायदान बन जाएगी।
भर देगी मुस्कान अधर पे, सुर में सने ठहाकों से।

माँ बनकर उस वक़्त तुम्हें, थकान नहीं होने देगी।
तुम सुबह उसको दे दो, वह शाम नहीं होने देगी।

मुफ्त की दासी बन खुद को, आराम नहीं होने देगी।
करेगी सबकुछ पर खुद का कभी नाम नहीं होने देगी।

बात-बात पर टोकेगी, भाषण भी खूब पिलाएगी।
पर, हो जिससे नुकसान तुम्हें, वह काम नहीं होने देगी।

बहन सरीखी ध्यान धरे, परेशान नहीं होने देगी।
तुम सुबह उसको दे दो, वह शाम नहीं होने देगी।

इक गणिका की भाँति वह, उन्माद के शीर्ष दिखाएगी।
गात की गंगा-यमुना बनकर, लहर-लहर उतरायेगी।

भुजा-परिधि के पाश बाँधकर, अंग-अंग इतरायेगी।
अधरासव का पान कराकर, मय का हाल बताएगी।

खुद से बढ़कर दूजा कोई जाम नहीं होने देगी।
तुम सुबह उसको दे दो, वह शाम नहीं होने देगी।

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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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