देशभक्त

सारे जग को बिसार,देते तन मन वार,
करे भारती के लाल,वो कहाँ आराम है ।

काटे दस दस शीश,मारे एक संग बीस,
नही डरते वो चाहे,कुछ भी अंजाम है ।

भूलकर जाँत पाँत,बस कहे यह बात,
अपनी माँ भारती ही ,अल्हा और राम है ।।

माँ भारती के शान को,होते है कुर्बान जो,
ऐसे देशभक्तो मेरा,नमन प्रणाम है ।।


~नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”

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