धन के बिन धनतेरस कैसे?

जेब पड़ी है ठंडी देखो, शून्य बटा सन्नाटा जी।
धन के बिन धनतेरस कैसे, कहो मनाया जाता जी?

बाजारों में हाथ बांधकर, हमने किया सपाटा जी।
गए भले मिष्ठान देखने, लाये चावल आटा जी।

मंथ एन्ड ने हमको मारा, एक करारा चांटा जी।
खींच रही हैं बेगम हमको, गले फंसाकर काँटा जी।

बोली घर अब चलो तुम्हारा, सारा नशा उतारूँ जी।
आज कायदे से क्रय की है, चिमटा बेलन झाड़ू जी।

अपनी खातिरदारी होगी, चलता हूँ अब टाटा जी।
धन के बिन धनतेरस कैसे, कहो मनाया जाता जी?


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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