धिक्कार है, धिक्कार है

मनुष्यता दिखती नहीं, बस क्लेष का अंबार है,

इंसान है पाषाण अब, धिक्कार है, धिक्कार है।

संवेदनाएँ शून्य हैं, और भावना का लोप है,

इंसान की गलती नहीं, नैर्जन्य का प्रकोप है।

नंगी क्षुधा नाची करै, क्यों निर्धनों के उदर में,

क्यूँ हाथ फैलाते चलें, इस ग्रासिता के समर में?

अपितु क्षुधा की ज्वाल यह, विवेक भस्माभूत हो,

जूठन की भी लिप्सा बडी़ , यों भगं हो या छूत हो।

दरिद्रता ने इस कदर, यूँ हाथ फैलाए रखी,

संतोष ने मस्तिष्क से सदैव मुँह बाए रखी।

क्यों हमने भी प्रबंध ना दो-एक निवाले कर दिये?

याचक को पशुता की जटिल हद के हवाले कर दिये।

अपना हृदय संतप्त था, मानवता उसकी छीनकर,

वह खा रहा था शौक से, कचरे से जूठन बीनकर।

संसार की सभ्यता से संसर्ग का संताप है,

हममें में भी पाशविकता दिखी, बस यही पश्चाताप है।


~ पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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