पत्र लिखता हूँ प्रभो

“साहित्य संगम” को समर्पित आज की मेरी रचना।

पत्र लिखता हूँ प्रभो, मैं हिन्द, हिंदी-राष्ट्र-हित।
संस्कृति, संस्कार व, “साहित्य संगम” के निमित्त।

विश्व में वैदिक-विभा से, ज्ञान का प्रकाश हो।
जाड्यता का नाश हो, विज्ञान का अनुप्रास हो।

वर्ण के हम बीज बोयें, काव्य की कलियाँ फले।
और विधा के वेग से तब, शिल्प की शाखा हिले।

वर्त्तनी के उर्वरक से, व्याकरण भी हो फलित।
पत्र लिखता हूँ प्रभो, मैं हिन्द, हिंदी-राष्ट्र-हित।

सृजन अपना शिष्ट हो, अनुशासनी-आसव दिखे।
हर शब्द में सौंदर्य हो, हर वाक्य में वैभव दिखे।

सौम्य हो शब्दावली, हर शब्द में अभिप्राय हो।
पदों में पीयूष हो और, मुक्तकें-मधुराई हो।

हो उठे दिल भी द्रवित, कि भाव ऐसे हों निहित।
पत्र लिखता हूँ प्रभो, मैं हिन्द, हिंदी-राष्ट्र-हित।

काव्य ही कमरा मेरा, साहित्य ही घर-बार हो।
और “संगम” के सुधिजन, ही मेरे परिवार हों।

और नवोदित नभचरों से, नित नया कलरव रहे।
देव भाषा का समूचे राष्ट्र में विप्लव रहे।

संस्कृति बहुमूल्य अपनी, रहे सृष्टि को विदित,
पत्र लिखता हूँ प्रभो! मैं हिन्द, हिंदी-राष्ट्र-हित।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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