परिचय कैसा

जब भूख नहीं हो भावों की, जज्बातों से परिचय कैसा?
जिसने दिन ही न देखा, उसका रातों से परिचय कैसा

उसका संघर्ष से क्या परिचय?जो रहा पालने में हरदम!
दीये की नाजुक लौ का,झंझावातों से परिचय कैसा?

उस नए अस्त्र का क्या परिचय? जिसने फौलाद न दागे हों!
बारूद जलाकर सीने में, जिसने पीतल न त्यागे हों!

जिसके अंतर में राख ने अपनी, तनिक महक न छोड़ी हो!
औ’ सुनकर जिसकी विकट गर्जना, भीत-अरि न भागे हों!

उस नए अस्त्र का कुरुक्षेत्र के, घाटों से परिचय कैसा?
दीये की नाजुक लौ का, झंझावातों से परिचय कैसा?

इहेतुक मनुज का परिचय है, तो उसके कर्म के संचय से।
उसके अनुभव का परिचय है, श्रम के सह बने समन्वय से।

परिचय उसकी मोहताज नहीं, यह उसे समझना ही होगा।
परिचय इस जग में बनता है, उसके व्यक्तव्य के आशय से।

जो निरा मूर्ख है, उसका ऐसी बातों से परिचय कैसा?
जिसने दिन ही न देखा, उसका रातों से परिचय कैसा?
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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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