प्रेम

प्रस्तुत करता हूं जीवन का एक सत्य पहलू –

– प्रेम

इस प्रेम से भरे जीवंत संसार में कोई भी प्रेम से अछूता नही…फिर चाहे वो कोई भी प्राणी अर्थात मनुष्य ,जीव-जंतु
क्यों ना हो…
प्रेम एक ही है …रूप अलग-२ … प्रथम प्रेम माँ का जो किसी भी प्राणी को संसार में आते ही प्राप्त होता है…पिता का प्रेम..भाई-बहन का प्रेम, परिवार जन रिस्ते नाते सबका प्रेम see here..ज्स घर में रहे उसका प्रेम..जिस वातावरण में रहे उसका प्रेम..विद्यालय,गुरूजन,मित्रों का प्रेम…प्रकृति सौन्दर्य का प्रेम…अन्य प्राणियों का प्रेम..अगर घर में कुत्ता गाय तोता अन्य जानवर हों तो उनसे प्रेम..निर्जीव वस्तुओं रुपया पैसा गाड़ी खिलौना कपडे. आदि से प्रेम…यौवनावस्था में आईने से प्रेम..श्रृंगारिता प्रधान प्रेम..युवक युवती का प्रेम..पती पत्नी का प्रेम..बच्चों का प्रेम….और जो कण कण में बसा है उस ईश्वर का प्रेम….
प्रेम के ये सारे अलग-२ रुप प्रत्येक मनुष्य में होता है…अन्य जीव जो सांसारिक भोग विलास ऐश्वर्य से कोई सरोकार नही रखते उनमें प्रेम के रुप सूक्षम होते हैं….
उपरोक्तनुसार प्रेम का हर रूप हर मनुष्य में विद्यमान होकर सांसारिक मोह-माया एवं एक आदर्श जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य करता है…

श्रृंगार प्रेम, प्रकृति प्रेम, देश प्रेम, एवं प्रकृति में विद्यमान प्रेम का समग्र रूप जिस मनुष्य के भीतर आ जाए और वह इन सभी रूपों का काव्यत्मक ,साहित्यिक निरूपण कर सके ,वही कहलाता है कवि….
कलम से-आशीष पान्डेय जिद्दी

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