फागुन-फागुन एक बरस

नैया बन गए नैन हमारे,
तू….. हुई ना टस-से-मस।
झलक तुम्हारी भर लेने को,
आंखें अपनी गईं तरस।

रंग भी अपना पकिया हो गया,
अधर-चाशनी हुई सरस।
तूने की जो लेट-लतीफी,
फागुन-फागुन एक बरस।

अब तो आ जा रे निर्मोही,
दिल में उठती कशम-कश।
लहर समा दे बदन हमारे,
प्रीत पिरो दे गशम-गश।

प्रेम के रंग उड़ेलो तबतक,
जबतक मैं ना कह दूँ “बस!”
अब तो आ जा रे निर्मोही,
फागुन-फागुन एक बरस।

अबकी सरसों खूब फली है,
वात बहाती सोंधी-रस।
मन झूमे जैसे पुरबा ने,
नशा पिरोया हो नस-नस।

चहुँ दिशा गुलज़ार मगर,
खाली खाली सा है अंतस्।
अब तो आ जा रे निर्मोही,
फागुन-फागुन एक बरस।
———
*पं० सुमित शर्मा ‘पीयूष’*

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