फ्रेंडशिप की बैंड

फ्रेंडशिप की बैंड बांधकर, जिसने गले लगाया कल,
गले लगाकर भावुकता की पट्टी मुझे पढ़ाया कल।

कल ही किसी और को भी एफ-बी पर उसने पोस्ट किया,
“यू आर माय बेस्ट-फ्रेंड, आई लाइक यू मोस्ट किया।”

और मुझे भी टैग कर दिया, साठ-छियासठ लौंडों संग,
चितकबरे, मुंहजले, खोपड़े, भूरे-भट्ठे, भौंडों संग।

मैंने उसके नाम संदेशें, अपनी वॉल पे डाली थी,
लाइक-हीन, नीचे कमेंट की थाली बिलकुल खाली थी।

उसने भी प्रतिक्रिया ना दी, दिल अपना भर आया था।
साल बाद उससे मिलने को मैं छुट्टी पर आया था।

आज सुबह उसके बिहैव से, मैं कट्टी कर आया था।
उसने खीर खिलाई, मैं सुबहा टट्टी कर आया था।

फोन लगाकर गुस्से में, कह डाली उसको खरी-खरी,
जो मन में आया बक डाला, बातें सारी भली-बुरी।

और ब्लॉक कर डाला उसको, अपनी सोशल साइट से,
आँखें मेरी भीग रही थी, कल की बीती नाइट से।

बैठा था स्मार्टफोन पे, और गेट पे नॉक हुआ,
दरवाजा खोला तो उसको खड़ा देख मैं शॉक हुआ।

वो खड़ूस सा घूरता मुझे, घुस आया घर के भीतर,
और गद्द सा बैठ गया वह रखी अकेली कुर्सी पर।

और हमारी पत्नी जी भी थीं मशगूल रसोई में,
“परथन” लगा रही थी नारी, वहीँ आखिरी लोई में।

“भाभीजी…..!” की सुन पुकार वह घबड़ाकर बाहर निकली,
घूंघट भी ना सम्हाला, थी माथे पर तिरछी टिकुली।

नमस्कार कर बोली “बैठो”, हाथ धुलाकर आती हूँ,
आप करो संवाद, अभी मैं चाय बनाकर लाती हूँ।

मैंने उसको देखा, उसने भौंह-चढ़ा मुंह फेर लिया,
और ललाट पर क्रोध भाव के अनगिन अंश उकेर लिया।

ना कुछ वह बोला न मैं, कुछ आयी जब आवाज नहीं,
शंकित हो आयी पत्नी, क्यों हुए ठहाके आज नहीं?

वह बोला भाभीजी, इनको स्मार्टफोन से दूर करो,
बिना फेसबुक, व्हाट्स एप्प के रहने को मजबूर करो।

वर्ना यह डिजिटल के चक्कर में ही मारे जायेंगे,
और तकनीक के फेरे में सब मित्र बिसारे जायेंगे।

यह कहकर उसने तिरछी नजरों से मुझको देखा फिर,
मेरे मन में क्या आया? मैंने भी सेलफोन फेंका फिर।

गले लगाकर बोला उसको, भैया मुझको माफ़ करो,
नेट के चक्कर में निष्ठुर हो गया हृदय था, साफ़ करो।

बैंड-विड्थ के बंधन में, क्यों बंधु को बिसराना है?
फेसबुक के फेरे में क्यों, नकली मित्र बनाना है?

गैजेट के ग्रिल में अपना अब, रिश्ता रोस्ट नहीं होगा।
और किसी भी “डे” का विश, फेसबुक पे पोस्ट नहीं होगा।


~पं0 सुमित शर्मा “पियूष”

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