बहाने मत बनाओ

मन जब आहत होता है
यादो के कोने मे रोता
अहसासो के भंवर मे
प्रेम नैया डुबोता ,
वियोग की घडी और लंबी
हो जाती प्रियतम जब
याद तुम्हारी आती,
निकाल लेती लिखी तेरी पाती शब्दो को छूती ,
मानो तेरे हाथ को चुमा हो,
दिल को सुकुन आ जाता,
अपने सपनो मे ,
ख्वाहिशो की धागा से तुझे बुना हो ,
पहन इसे इतराती ,
दिल के व्याकुल सितार में
राग तेरे ही बजते,
प्रियतम की दूरी को
ये भी समझते,
विरह सूर ही गाते ,
मधुर मिलन की आस लीये,
मन जब आहत होता ,
तेरी याद संजोये नयन
से ना नीर बहते ,
इंद्रधनुष सी छवि कहीं,
धुमिल ना हो जाये ,
अब बताओ ना परदेशी,
क्या “”प्रियतमा””
कि याद आती है,बैरन सौतन ये नौकरी ही तुझे भाती है ,
बहाने मत बनाओ “छुट्टी””नहीं है,
अर्जी दो आ जाओ प्रिय,
रात-दिन टकटकी सी लगी है,
और ना सताओ ,मिलन की आस लगी है !!


~अनीता मिश्रा “”सिद्धि””

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