बारह लाख के पापाजी

तुम मिट्टी के कुल्हड़ पापा, अब गुल्लक बन बैठे हो।
हम लोहा रह गए पिताजी, तुम चुम्बक बन बैठे हो।

अब आये हैं शरण तुम्हारे, अब हमको न दूर करो,
हे मुद्रा के मालिक अब तुम, नमन मेरा मंजूर करो।

अब हमको हिस्सा दिलवा दो, बारह लाख के पापाजी,
फटी पड़ी है, अब सिलवा दो, बारह लाख के पापाजी।

हमने जब तुम्हरे चौके से, पल्ला अपना झाड़ लिया।
तुमने पूरा गंगाजल… कलशे में अपने ढार लिया।

हम मुट्ठी भर अक्षत खाकर, सिर से पाँव तक ऐंठ गए।
बारह चम्मच घी लेकर तुम, हवन कराने बैठ गए।

अपना भी कलशा हिलवा दो, बारह लाख के पापाजी।
फटी पड़ी है, अब सिलवा दो, बारह लाख के पापाजी।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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