बुखार-ए-इश्क

जब चढ़ता है तो उतरता नही,
कोई भी इसकी पीडा़ से उबरता नहीं„
एक मीठा एहशास रहता है हर पल,
ये बुखार-ए-इश्क है जो उतरता नही|
किसी को महबूब की याद,
किसी को वफा सताती है„
जब हो जाता है इश्क किसी से,
ख्वाहिशें बढ़ती जाती हैं„
कोई करता है सज्दा,
कोई पूजा बना लेता है”
एक इश्क रहता है,
तस्वीरें बदलती जाती हैं|
किसान को अपनी फसल से,
कवियों को अपनी गजल से„
इश्क के ही रंग रूप हैं सब,
कोई दरिया से कोई कमल से„
बैठ जाते हैं किनारे लहर देखते,
कुछ आशिक किनारे का सबर दखते„
उसे भी करते हैं महसूस इश्क वाले,
तोड़ती है कैसे किनारे लहरों का कहर देखते

~आशीष पान्डेय जिद्दी

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