भगवान तो इधर है

प्रत्यक्ष वह नहीं है, फिर ढूँढता किधर है

इस तरफ देख पगले, भगवान तो इधर है।

अपने ही घर से अपना बहिष्कार हो चुका है,

मंदिर से वस्त्र लेना, इनकार हो चुका है।

व्यर्थ करे आखिर, बरबाद क्यों समय तू?

इन याचकों के जमघट में ढूँढ ले हमें तू।

मेरे ही भक्तजन, मुझसे तन बचाते सरके,

भौंहें चढ़ा लीं तूने भी मुझे देख कर के।

विडम्बना थी भारी ऐसा बिलख पड़ा मैं,

हाँ! उन्हीं भिक्षुओं की टोली में था खड़ा मैं।

ऊँची चहारदीवारी, जागीर ना हमारी,

मंदिर का भी किराया तहसीलते पुजारी।

मिष्टान्न का चढ़ावा, हमने नहीं उतारा,

मंदिर की दानपेटी पे हक नहीं हमारा।


~ पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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