भाई का न प्यार मिला

एक उदर से जन्म लिया, पर दो-तरफा संसार मिला।
जीवन में हर खुशी मिली, पर भाई का न प्यार मिला।।

जिसके घर मैं जन्म लिया, उस तात ने जी-भर प्यार दिया।
तीन बहन एक भैया जैसा, सुंदर सा परिवार दिया।।

होकर कलुषित फिर दाता ने, कैसा यह विचार किया?
स्नेह बहन का, द्वेष भाई का, कैसा प्रत्त्युपहार दिया!

एक ही छत के नीचे पले, और एक सा ही संस्कार मिला।
जीवन में हर खुशी मिली, पर भाई का न प्यार मिला।।

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फूटी थी नफरत की कोंपल, आडम्बर का प्यार रहा।
जीवन भर भैया की नज़र में, मैं इक हिस्सेदार रहा।।

बुरी भावना के प्रभाव से, क्षीण हुआ, मजबूर रहा।
आँखों का काँटा बनकर मैं, दिल से उसके दूर रहा।।

दीप्ति की थी अभिलाषा, पर तिमिर पे ही अधिकार मिला।
जीवन में हर खुशी मिली, पर भाई का न प्यार मिला।।

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अग्रज-अनुज में भेद है कितना, आज मैंने जाना है।
बंधु एक-बंधन की भाँति, बस यही पहचाना है।।

राम ने लक्ष्मण को ठुकराया, कृष्ण को न बलराम मिला।
स्नेह था ऐसा क्षणभंगुर, आरम्भ में ही विराम मिला।।

शरण में उसके स्नेह चाहता, फिर भी बस फटकार मिला।
जीवन में हर खुशी मिली, पर भाई का न प्यार मिला।।

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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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