मंतर अइसा मार गई

 

पहिले मिलन में ऊ मनमोहि, मंतर अइसा मार गई।
ब्रह्मचर्य का टीका हमरा, जेन्ने-तेने लेसार गई।

हमरा संयम के गठरी के, शनैः शनैः खंगाल गई।
खोल खोपड़ी का ढक्कन, ऊ लभ का जोरन डाल गई।

नेह का नींबू-रस निचोड़ के, प्यार का छेना फाड़ गई।
पहिले मिलन में ऊ मनमोहि, मंतर अइसा मार गई।

उसके नजर की नैया डोली, हमरा मन भी मचल गया।
उसके छुअन का झटका पाकर, सब बरियारी निकल गया।

हम बजरंगबली के चेला, मुंहवे भारे बजाड़ गई।
पहिले मिलन में ऊ मनमोहि, मंतर अइसा मार गई।

झिझक का झींगुर हमरे भीतर, खोज खोज कर मार गई।
इस्माइल के स्विंग बॉल से, हर स्टंप उखाड़ गई।

दिल के हर जज्बात खोलकर, पब्लिकली पसार गई।
पहिले मिलन में ऊ मनमोहि, मंतर अइसा मार गई।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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