महक पीकर आ गया

तेरे कंगन की खनकती खनक पीकर आ गया।
मैं तेरी गलियों की सोंधी महक पीकर आ गया।

उफ्फ! तेरा दीदार बेशक मैं न कर पाया मगर।
मैं तेरे महफ़िल की पूरी मशक पीकर आ गया।

सुन रखा था कि तेरी आवाज में है चाशनी।
कंठ में लावण्य है, और शब्द तुलती मापनी।

मैंने सोचा कि तेरी आवाज का मय चख ही लूँ।
पर छतों पर कुछ पखेरू गा रहे थे रागिनी।

उन चिड़ों की चहचहाती चहक पीकर आ गया।
मैं तेरी गलियों की सोंधी महक पीकर आ गया।

था सुना आँचल में तेरे चांदनी शीतल बसे।
भोर की ठंडक, सुनहरी शाम का बादल बसे।

मैंने सोचा बाँट लूँ ठंडक तुम्हारे ओट की।
फासलों में धूप थी, अरमान सारे चल बसे।

फासलों के धूप की वह दहक पीकर आ गया।
मैं तेरी गलियों की सोंधी महक पीकर आ गया।

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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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