माफीनामा

नया छंद है, नई कथानक, नया कलामा लिखता हूँ,
पश्चाताप की स्याही से एक माफीनामा लिखता हूँ|
बीते-दिन जिस बात को लेकर था बकवास किया मैंने,
कान पकड़ सौ बार पृष्ठ पर रामा-रामा लिखता हूँ|
नादानी थी, बातों में भी कहीं बचपना बाकी थी|
और अज्ञानता के आवेश में हो बैठी गुस्ताखी थी,
क्या मैं करूँ? कवि हूँ, नीची हस्ती अपनी भूल गया,
अधर खोलने से पहले औकात न अपनी आँकी थी|
उम्र न देखी, लिंग न देखा, पद का अंतर भूल गया,
ठहरा कुएँ का मेंढक, तेरा ज्ञान-समंदर भूल गया|
जिस पद पर हो आप प्रतिष्ठित, जो उस पद की गरिमा है,
उस तुलना में मेरी हैसियत कितनी कमतर, भूल गया|
हरदम हँसने की आदत से, मैं प्रतिदिन परेशान रहा
कब-किससे-क्या कहते हैं, इस बात का भी न ध्यान रहा
रही आखिरी भूल, न कोई अब ऐसा अवसर दूँगा,
कविता की सौगंध, मैं देखो गलती अपनी मान रहा,
दुनिया पर टे-टे करता, पिंजड़े में पड़ा परिंदा हूँ,
अपनी ही बदहाली का माखौल उड़ाकर, जिन्दा हूँ,
गर गरिमा पर घात लगा हो, मुझे माफ़ कर दो देवी,
उस अक्षम्य अपराध के लिए, बहुत बहुत शर्मिंदा हूँ|


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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