मित्रता अवसर नहीं

मित्रता अवसर नहीं, यह एक उत्तम भाव है।
स्वार्थ की सिद्धि नहीं यह जीव का स्वभाव है।।
क्या कहूँ इसका प्रयोजन? शब्द ही मिलते नहीं!
शहर के इस शोर में यह गुनगुनाता गाँव है।।

परस्पर सह-भाव से ही प्रस्फुटित होता है ये,
प्रेम की पवित्रता से नित शुचित होता है ये।
कोई भंगुरता नहीं, जब मित्रता सच्ची रहे,
उम्र की ऊँचाइयों पर भी फलित होता है ये।

इंसान का इंसान से, अपनत्व का बर्त्ताव है,
मित्रता अवसर नहीं, यह एक उत्तम भाव है।

मित्र हों यदि संग तो मरुथल में भी उपवन खिले,
साथ अपने मित्र हों, गूलर में भी मंजरी मिले।
मित्रता का बल समूचे शस्त्र से भी श्रेष्ठ है,
मित्र हो बजरंग सा, अंगद का न आसन हिले।

द्वेष के प्रासाद पर, परमाण्विक प्रभाव है,
मित्रता अवसर नहीं, यह एक उत्तम भाव है।।

दमकते कंचन-गिरि की चोटियाँ हैं मित्रता।
स्नेह के सारंग की, दो कोटियाँ हैं मित्रता।।
एक सा ही स्वाद लेकर, एक थाली में रखीं,
घी सनी-चुपड़ी हुईं, दो रोटियाँ हैं मित्रता।।

चिलचिलाती धूप में यह कुनकुनी सी छाँव है।
मित्रता अवसर नहीं, यह एक उत्तम भाव है।।

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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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