मुंह पर कालिख

गौतम बुद्ध की धरती पर, और आर्यभट्ट की माटी में।
पूरा विश्व झुका था जिनके, पुरखों की परिपाटी में।

जिसने रेणु, दिनकर उपजे, कुंवर सिंह, और शेरशाह।
गुरु गोविंद सा मार्ग-प्रदर्शक, चाणक्य जैसा बुद्धिशाह।

भारत के जो हृदय-पटल पर, तमगे सा सु-शोभित है,
वर्त्तमान में अपनों के कुकर्मो से वह क्षोभित है।

फूहड़ सा आयाम दिया है, कलियुगी कलाकारों ने।
मुंह पर कालिख पोत दिया है, नंगेपन के मारों ने।

संस्कार को रटने वाले, घर में छिपकर रोते हैं।
बी. ठाकुर की धरती पर, अब अंग प्रदर्शन होते हैं।

दो-कौड़ी के छुटभैयों ने, पूरा बेड़ा-गर्क किया।
घर से बाहर रहना दूभर, सबका जीवन नर्क किया।

निजी पलों को जोर-शोर से, गीतों में मढ़ लेते हैं।
द्विअर्थी संवाद पिरो कर, मंचों पर चढ़ लेते हैं।

भोजपुरी अब विकृत हो गई, फूहड़ हर संगीत हुआ।
अरे ‘भिखारी’, तेरे घर में, कैसा मटियामेट हुआ?

मुझे शिकायत उनसे है जो, इनको शह दे देते हैं।
बेटी, बहु के संग मजा ये, भोजपुरी का लेते हैं।

इनकी मौन-स्वीकृति से ही, उनके दम भर जाते हैं।
एक का गुड़ न पिघला कि, दूजे गोबर ले आते हैं।

अब भी तनिक न चेते तो ये फिर आगे पछतायेंगे,
अपनी ही पहचान ढूंढते, जीवन भर रह जाएंगे।
क्रमशः…..
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कवि : पं० सुमित शर्मा ‘पीयूष’

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