मुझको इबादत दे

कोई कातिल मुझे आकर,मुहब्बत में शहादत दे।
मुझे बाहों में लेकर के, मुझे वो दिल से चाहत दे।
करूँ मैं प्यार हद से ज्यादा उसको, दे अगर मौका।
मुझे वो कत्ल कर भी दे, मगर मुझको इबादत दे।

जज्बात पुराने हो जाएं पर,दिल ये पुराना न होगा।
अब तक मेरे दिल में वो है,किसी और का आना न होगा।
शायद उसको याद नहीं है,या वो भूला है मुझको।
मेरा दिल था उसका ठिकाना,ये बात भुलाना न होगा


~आशीष पाण्डेय “जिद्दी”

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