मृत्यु बाँट रहे हो तुम

कहाँ खुरदरी खुरपी लेकर, समतल पाट रहे हो तुम?
कंकड़ की ढेरी परोसकर, हीरे छाँट रहे हो तुम।

माना हमको क्या मतलब है, तुम किसकी परवाह करो?
पर क्या तुमको भान नहीं, कि मृत्यु बाँट रहे हो तुम।

छीन चुके हो लौ कितनी तुम घर के नए चिरागों से।
फेल का मतलब क्या होता है? पूछो उन्हीं अभागो से।

क्या होगा जिनका भविष्य यूँ अधर में तुमने छोड़ा है?
होकर लापरवाह, मनोबल जीर्ण-शीर्ण कर तोड़ा है।

नौसिख चिड़ियों के उड़ते में, डैने काट रहे हो तुम।
क्या तुमको यह भान नहीं, कि मृत्यु बाँट रहे हो तुम?

स्याह-स्याह कर डाला तुमने, उन विहगों के पाँखों को,
रज-कण से भर डाला तुमने, राह खोजती आंखों को।

भ्रष्ट हुई हर शिरा तुम्हारी, हर धमनी बेईमानी है।
धन-लिप्सा में सूख चुका, अंधी आँखों का पानी है।

धन बटोरने को किन-किन के तलवे चाट रहे हो तुम?
क्या तुमको यह भान नहीं कि मृत्यु बाँट रहे हो तुम?

तुम जामन तक ना दो फिर हम दही जमा कर दें कैसे?
तुम शिक्षक दो शून्य हमें, हम अंक कमा कर दें कैसे?

पहले पूरी करो व्यवस्था, फिर अंकों का खेल करो।
शिक्षण की तुम रीढ़ सुधारो, तब उत्तीर्ण या फेल करो।

आत्म-प्रशंसा के झूठे पर्चे क्यूँ साट रहे हो तुम?
क्या तुमको यह भान नहीं, कि मृत्यु बाँट रहे हो तुम?

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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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