मेरी दाढ़ी में उजले से बाल आ गए

हाय देखो, बुढापे के साल आ गए,
मेरी दाढ़ी में उजले से बाल आ गए।

अभी तो पच्चीसी चढ़ी भी नहीं,
प्रणय की तो पुस्तक पढ़ी भी नहीं,
अभी तो न देखा है दुनिया-जहां,
कहो हम के जाएँ, तो जाएँ कहाँ?

जवानी में जी के जंजाल आ गए,
मेरी दाढ़ी में उजले से बाल आ गए।

जी दर्पण में आँखें थी अपनी गड़ीं,
भला कौन विपदा यहां आ पड़ी?
क्यों दिखते सितारे मेरे गालों पर?
खुदा का कहर टूटा है बालों पर,

जी माथे पर मेरे रुमाल आ गए,
मेरी दाढ़ी में उजले से बाल आ गए।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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