मैं आँख बंद करके, प्रकाश ढूंढता रहा

मैं मंदिरों के अंदर, भगवान ढूंढता रहा।
और मंदिरों के बाहर, इंसान ढूंढता रहा

मैं मुर्दों में जीवन की, आस ढूंढता रहा।
मैं आँख बंद करके, प्रकाश ढूंढता रहा।

मैं सरहदों पे जाकर, सुकून ढूंढता रहा।
और जाहिलों में जज्बा, जूनून ढूंढता रहा।

वो ले गए क़तर कर, सिर इंक्लाबियों के।
और अपने आंगनों में, मैं खून ढूंढता रहा।

सुबूत का पिपासु, मैं लाश ढूंढता रहा।
मैं आँख बंद करके, प्रकाश ढूंढता रहा।

जिनके चिराग बुझ गए, वो अब भी होश में हैं।
आँखें रुदन से भींगी, पर अब भी रोष में हैं।

कहते हैं सौंप देंगे, “हीरे” वतन की खातिर।
हैं कोख से जने जो, जो अब भी कोष में हैं।

संताप में मैं शौर्य का, अहसास ढूंढता रहा।
मैं आँख बंद करके , प्रकाश ढूंढता रहा।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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