मैं हार गया बचपन

मैं हार गया बचपन, मेरे जीवन का सावन।
क्रीड़ाओं का उपवन, यादों का सुंदरवन।।

उन्मुक्त सा वो गीतों का गगन, सब लील गया यौवन।
मैं हार गया बचपन, मेरे जीवन का सावन।।

मैं हार गया गेंदे की कली, वो तितली की पाँखें।
वो रात में टिम-टीम कर जलती, नभ की अनगिन आंखें।

अब रात गुजरती है जैसे, कहीं जाने की जल्दी है।
सुबह तो यहाँ होती ही नहीं, बस धूप निकलती है।।

मैं हार गया देखो, वह भोर की पहली किरण।
क्रीड़ाओं का उपवन, यादों का सुंदरवन।।

मैं हार गया सावन का नशा, वो बारिश का पानी।
वो आम के पेड़ों पर चढ़कर, हर रोज की शैतानी।।

अब चाह के भी लौटा न सकूँ, जो बीत गईं घड़ियाँ,
सब भूल गया होली का जतन, दिवाली की फुलझड़ियाँ।।

मैं हार गया माँ के, आँचल का सोंधापन।
क्रीड़ाओं का उपवन, यादों का सुन्दरवन।।

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~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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