सत्य नहीं कह सकते हो तुम

सत्य नहीं कह सकते हो तुम
झूठ पाप का बोझ लिये हो
पहन लिये हो सच का मुखौटा
मन में अहं और लोभ लिये हो
कब तक चादर ढक पाओगे
कहां तक सत्य छुपाओगे
लोभ काम और मोह दंभ को
कब तक हृदय बसाओगे
एक दिन सब मिट जायेगा
कुछ काम न तेरे आएगा
ये अज्ञानी प्राणी सुन ले
बाद समय पछतायेगा
फिर न कोई तेरा होगा
अंधकार घनेरा होगा
गम की रात में होगा जीवन
न खुशियों का तेरी सबेरा होगा
पश्चाताप भी मुश्किल होगा
क्या प्राणी तुझे हाशिल होगा
खुल गई कलई जब तेरी सोच
न सर को उठाने के काबिल होगा
ताने सुनकर मर जाना होगा
अपनों को खोकर जाना होगा
सोच मिलेगा क्या तुझको
झूंठ का क्या हरजाना होगा
सब पाप द्वेष का त्याग कर
सत्य की राह अपना ले तू
झूंठ का साया मन से दूर
ईश्वर की महिमा गा ले तू
अब ईश्वर का ही सहारा है
सत्य की नौका को जिसने
झूंठ के भव से तारा है
सब पाप लोभ का अंत किया
ईश्वर का वास हृदय हमारा है

-आशीष पान्डेय जिद्दी

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