समाज देखता रहा

मनचलों के मीत का, प्रपंच भरे प्रीत का।
फूहड़ी भाषा लिए, कलयुगी संगीत का।

बज रहा था साज और, समाज देखता रहा।

अंग नंग-धड़ंग था, उरोज पर उमंग था।
अश्लीलता थी व्याप्त और, हर कोई उद्दंड था।

था कामुकी अंदाज और, समाज देखता रहा।

अश्लीलता चरम पे थी, एक नार बस रहम पे थी।
पाप की तलवार लटकी, मानवी धरम पे थी।

था विधर्मी आगाज और, समाज देखता रहा।

वह रात भर की राग थी, वह पूरी दाग दाग थी।
वह क्षुब्ध थी, मगर जनों…. उसके उदर में आग थी।

बस लुट रही थी लाज और, समाज देखता रहा।


~पं० सुमित शर्मा “पीयूष”

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