सिजदे में सर झुक जाने को अपमान नहीं कहते

माना गुरुवर को अब बच्चे भगवान नहीं कहते,
हम दादा कह वंदन करते, श्रीमान नहीं कहते।
जय-जय हिंदी का पटल हमारा मंदिर है मित्रों,
सिजदे में सर झुक जाने को अपमान नहीं कहते।

इनके प्रताप से कइयों ने साहित्य की सीढ़ी पाई है,
उनकी ही ‘मधुर’ वाणियों से, सृष्टि की ‘भावना’ आई है।
जिनके विनोद में भी हमने व्याकरण की गरिमा पाई है,
उनके दो एक लतीफों में प्रीति की ‘सरस’ मिठाई है।

दो व्यंग्य-बाण को मित्रों शर-संधान नहीं कहते,
सिजदे में सर झुक जाने को अपमान नहीं कहते।

है ‘आस’ यही कि हो ‘प्रयास’ बस समिति के संवर्द्धन का,
स्वयं-‘सिद्धि’ पा लेने का औ’ अहं-असुर के मर्दन का।
‘शुक्ल’ चांदनी की ही भांति, ‘सरल’, ‘सहिष्णु’ जीवन का
गद्य-पद्य के बर्त्तन में प्रतिपल ‘पीयूष’ के सेवन का।

जो बातों से ढह जाय उसे मकान नहीं कहते,
सिजदे में सर झुक जाने को अपमान नहीं कहते।

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~पं० सुमित शर्मा ‘पीयूष’

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