हार हमारी ही होगी

वह कुत्ता जो जूठन खाकर,
हम पर ही गुर्राया था।
और हमारी रोटी जिसने,
बासी कह लौटाया था।

जिसको मेरे दर पर आना,
भी ना तनिक सुहाता था।
घर के बाहर भौंक-भौंक कर,
घंटों शोर मचाता था।

आज वो अपने चिंचड़े,
देखो हमें बांटने आया है।
पूँछ हिलाते मेरे आंगन,
थूक चाटने आया है।

तलवे मेरे चाट-चाट कर,
धब्बे अपने साफ किया।
ताकि हम भावुक हो कह दें,
जा-जा तुमको माफ़ किया।

मगर हमारे पावों पे,
जबड़ों की छाप अभी भी है।
मुँह न उसका तोड़ दिया,
यह पश्चाताप अभी भी है।

यूँ तो आज हमारे घर वो,
पूँछ हिलाता आया है।
पर उसकी नस-नस में दिखता,
मन का पाप अभी भी है।

हम उसके चिंचड़े खा लें,
दुत्कार हमारी ही होगी।
फिर कुत्ते से कटवा लें…
यह हार हमारी ही होगी।

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~पं० सुमित शर्मा ‘”पीयूष”

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