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गोरी तुम्हरे चक्कर में

 

मन मिसरी, मतवाली भे गई, गोरी तुम्हरे चक्कर में।
घर थाना, कोतवाली भे गई, गोरी तुम्हरे चक्कर में।

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April 4, 2017

अबकी छठ न आ पाउँगा।

अबकी छठ न आ पाउँगा, खुद ही पर्व कर लेना तुम,
बच्चे गर पूछें तो उनको,प्यार से सम...

April 3, 2017

पत्र लिखता हूँ प्रभो

“साहित्य संगम” को समर्पित आज की मेरी रचना।

पत्र लिखता हूँ प्...

April 3, 2017

काले धन का क्या होगा ?

पैसों की थी प्यास कहो, उस पागलपन का क्या होगा?
खोर-खोर कर जमा किया, उस खर-दूषण का क्या होगा?

April 3, 2017

समाज देखता रहा

मनचलों के मीत का, प्रपंच भरे प्रीत का।
फूहड़ी भाषा लिए, कलय...

April 3, 2017

बारह लाख के पापाजी

तुम मिट्टी के कुल्हड़ पापा, अब गुल्लक बन बैठे हो।
हम लोहा रह गए पिताजी, तुम चुम्बक बन बैठे हो।

April 3, 2017